नई दिल्ली: भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। यहां करीब 1.4 अरब लोग रहते हैं, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि इस देश में करीब 100 करोड़ लोग ऐसी स्थिति में हैं कि उनके पास जरूरी खर्चों के अलावा कुछ भी खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं।
ब्लूम वेंचर्स की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक भारत में जरूरी खर्चों से ज्यादा “खर्च” करने वाला उपभोक्ता वर्ग सिर्फ 13-14 करोड़ लोगों तक सीमित है। यह संख्या उत्तर प्रदेश की कुल आबादी से भी काफी कम है।
इसके अलावा करीब 30 करोड़ लोग ऐसे हैं जो धीरे-धीरे खर्च करना सीख रहे हैं, लेकिन उनके पास अभी भी खर्च करने के लिए जेब में पर्याप्त पैसे नहीं बचे हैं। डिजिटल पेमेंट ने भारतीय लोगों के लिए शॉपिंग को आसान बना दिया है, लेकिन इन लोगों की खर्च करने की आदतों में अभी भी हिचकिचाहट है।
इसी रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि भारत में अमीर लोगों की संख्या उतनी तेजी से नहीं बढ़ रही है, जितनी तेजी से पहले से अमीर लोगों की संपत्ति बढ़ रही है। यानी जो लोग पहले से अमीर हैं, वे और अमीर हो रहे हैं, लेकिन नए अमीर लोगों की संख्या में कोई खास इजाफा नहीं हो रहा है। अब इसका सीधा असर बाजार पर पड़ रहा है।
कंपनियां अब सस्ते उत्पाद बनाने के बजाय महंगे और प्रीमियम उत्पादों पर ध्यान दे रही हैं। उदाहरण के लिए लग्जरी अपार्टमेंट की मांग बढ़ रही है, जबकि किफायती घरों की हिस्सेदारी पांच साल में 40 फीसदी से घटकर सिर्फ 18 फीसदी रह गई है। महंगे स्मार्टफोन तेजी से बिक रहे हैं, लेकिन सस्ते मॉडल के खरीदार कम हो गए हैं। कोल्डप्ले और एड शीरन जैसे अंतरराष्ट्रीय सितारों के महंगे कॉन्सर्ट के टिकट पलक झपकते ही बिक जाते हैं, जबकि आम लोगों के लिए मनोरंजन महंगा होता जा रहा है।
भारत का मध्यम वर्ग भी मुश्किल में फंसता जा रहा है। महंगाई के साथ उनकी सैलरी में कोई खास इजाफा नहीं हुआ है। पिछले दस सालों में टैक्स देने वाले मध्यम वर्ग की आय दरअसल स्थिर ही रही है, यानी महंगाई के लिहाज से उनकी सैलरी आधी रह गई है। आज की बात करें तो मध्यम वर्ग की बचत 50 साल के सबसे निचले स्तर पर है। लोगों की जरूरतें बढ़ रही हैं, लेकिन आमदनी जस की तस है।
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