नई दिल्ली: कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने केंद्र सरकार पर शिक्षा क्षेत्र में तीन बड़े एजेंडों—केंद्रीकरण, व्यावसायीकरण और सांप्रदायिकता—को लागू करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति (NEP) 2020 के जरिए सरकार अपने असली इरादों को छिपाने की कोशिश कर रही है। जबकि हकीकत यह है कि सरकार भारत के बच्चों और युवाओं की शिक्षा के प्रति उदासीन है।
देश के एक प्रमुख अखबार द हिंदू में लिखे एक लेख में सोनिया गांधी ने कहा कि बीते 11 वर्षों में सरकार की कार्यप्रणाली पूरी तरह से सत्ता को केंद्र में समेटने पर आधारित रही है। शिक्षा के क्षेत्र में भी राज्यों को दरकिनार कर केंद्र ने मनमाने फैसले लिए हैं। उन्होंने कहा कि केंद्र शिक्षा सलाहकार की बैठक 2019 से नहीं हुई है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) लागू करने के दौरान भी सरकार ने राज्यों से कोई परामर्श नहीं किया।
सोनिया गांधी ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार शिक्षा को निजी हाथों में सौंप रही है। जिससे गरीब बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पाना मुश्किल हो गया है। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि 2014 से अब तक 89,441 सरकारी स्कूलों को बंद या विलय कर दिया गया है। जबकि 42,944 नए निजी स्कूल खोले गए हैं। इससे गरीब परिवारों के बच्चे महंगी और अनियमित निजी शिक्षा प्रणाली के हवाले कर दिए गए हैं। उन्होंने राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (NAAC) में रिश्वत कांड और राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) की अक्षमता का हवाला देते हुए कहा कि शिक्षा व्यवस्था में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है।
उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी की हत्या और मुगल भारत से जुड़े हिस्सों को पाठ्यक्रम से हटा दिया गया। यहां तक कि संविधान की प्रस्तावना तक को हटाने की कोशिश की गई है। जिसे जनता के विरोध के बाद दोबारा शामिल किया गया। इसके अलावा, विश्वविद्यालयों में सरकार समर्थक विचारधारा वाले शिक्षकों की नियुक्ति बढ़ रही है, जिससे शिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।
सोनिया गांधी ने शिक्षा प्रणाली में बढ़ते केंद्रीकरण, व्यावसायीकरण और सांप्रदायिकता को छात्रों के लिए हानिकारक बताया है। इसे ‘शिक्षा प्रणाली का नरसंहार’ करार दिया। उन्होंने सरकार से लोकतांत्रिक मूल्यों के तहत शिक्षा प्रणाली को मजबूत करने और सार्वजनिक शिक्षा को बचाने की अपील की।
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