नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें अदालत ने कहा था कि स्तन पकड़ना और पजामे का नाड़ा तोड़ना बलात्कार या बलात्कार का प्रयास नहीं माना जायेगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश का स्वतः संज्ञान लिया और कहा कि इस आदेश में संवेदनशीलता की कमी दिखाई पड़ती है।
जस्टिस भूषण आर गवई ने सुनवाई करते हुए कहा कि हमें एक जज द्वारा ऐसे कठोर शब्दों का इस्तेमाल करने पर खेद है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमने हाईकोर्ट का आदेश देखा है। ऐसा भी नहीं है कि फैसला जल्दबाजी में लिया गया है। इस मामले में सुनवाई पूरी होने के 4 महीने बाद फैसला सुनाया गया है और फैसला सुरक्षित रखा गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पीड़िता की मां ने भी कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उनकी याचिका को भी इसके साथ संलग्न किया जाना चाहिए। दोनों पर सुनवाई एक साथ आगे बढ़ेगी।
बता दें कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्तन पकड़ने और पायजामा का नाड़ा तोड़ने को बलात्कार मनाने से इनकार कर दिया था। कोर्ट ने इसे गंभीर यौन उत्पीड़न का अपराध माना। इलाहाबाद HC के न्यायमूर्ति राम मनोहर मिश्र ने कहा कि बलात्कार के प्रयास और अपराध की तैयारी के बीच के अंतर को सही तरीके से समझना चाहिए। इसके साथ ही अदालत ने आरोपियों के खिलाफ धारा 376 (बलात्कार) के बदले धारा 354-बी (निर्वस्त्र करने के इरादे से हमला) और पोक्सो अधिनियम की धारा 9/10 (गंभीर यौन हमला) के तहत मामला चलाने का आदेश जारी किया।
अदालत ने कहा कि आरोपी पवन और आकाश के खिलाफ लगाए गए आरोप मामले में दुष्कर्म के प्रयास का अपराध नहीं बनता है। पवन ने 11 वर्षीय नाबालिग पीड़ित के स्तनों को पकड़ा और आकाश ने उसके पायजामे का नाड़ा तोड़कर उसे पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश की थी। हालांकि राहगीरों के हस्तक्षेप के कारण उन्होंने रेप नहीं किया और बच्ची को वहीं छोड़कर फरार हो गए। कोर्ट ने अपने बयान में आगे कहा कि आरोपी निचले वस्त्र का नाड़ा तोड़ने में खुद परेशान हो गया था।