महावीर जयंती स्पेशल : सभी इन्द्रियों को जीतने के कारण ‘जितेन्द्रिय’ कहलाएं स्वामी

जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी माने जाते हैं. महावीर का जन्म 599 वर्ष पहले चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में त्रयोदशी तिथि को बिहार में लिच्छिवी वंश के महाराज श्री सिद्धार्थ और माता त्रिशिला रानी देवी के यहां हुआ था.

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महावीर जयंती स्पेशल : सभी इन्द्रियों को जीतने के कारण  ‘जितेन्द्रिय’ कहलाएं स्वामी

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  • April 9, 2017 6:52 am Asia/KolkataIST, Updated 8 years ago
मुंबई: जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी माने जाते हैं. महावीर का जन्म 599 वर्ष पहले चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में त्रयोदशी तिथि को बिहार में लिच्छिवी वंश के महाराज श्री सिद्धार्थ और माता त्रिशिला रानी देवी के यहां हुआ था. 
 
महावीर स्वामी के जन्म दिवस के अवसर पर चैत्र महीने की शुक्ल त्रयोदशी के दिन महावीर जयंती मनाई जाती है. इसलिए साल 9 अप्रैल के दिन मनाया जा रहा है.
 
वर्धमान महावीर का जन्म एक क्षत्रिय राजकुमार के रूप में एक राज परिवार में हुआ था.  उनका जन्म प्राचीन भारत के वैशाली राज्य के  गांव कुंडग्राम में  हुआ था.
 
भगवान महावीर कई नामों से जानें जाते हैं जिनमें वर्धमान, महावीर, सन्मति और साहसी आदि  मुख्य नाम  थे. भगवान महावीर का जन्म एक साधारण बालक के रूप में हुआ था इनकी कड़ी तपस्या की वजह से ही इनका जीवन अनूठा बन गया. 
 
ऐसा माना जाता है कि महावीर स्वामी का काफी अन्तर्मुखी स्वभाव के थे. शुरुआत से ही उन्हें संसार के भोगों में कोई रुचि नहीं थी लेकिन माता-पिता की इच्छा की वजह से उन्होंने वसंतपुर के महासामन्त समरवीर की पुत्री यशोदा के साथ परिणय सूत्र में बंध गए और जिससे उनकी एक पुत्री हुई जिसका नाम प्रियदर्शना रखा गया.
 
तीस साल की उम्र में उन्होंने घर-बार छोड़ दिया और कठोर तपस्या की वजह से कैवल्य ज्ञान प्राप्त किया. महावीर ने पार्श्वनाथ के आरंभ किए तत्वज्ञान को परिभाषित करके जैन दर्शन को स्थाई आधार दिया. महावीर स्वामी ने श्रद्धा एवं विश्वास की वजह से जैन धर्म की फिर से प्रतिष्ठा स्थापित की.
 
उन्होंने ‘अहिंसा परमोधर्म’ के सिद्धांत और लोक कल्याण का मार्ग अपना कर विश्व को शांति का सन्देश दिया. आधुनिक काल में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने पूरी दुनिया को अहिंसा के जिस महान आदर्श को अपनाने के लिए आह्वान किया था, उसके महत्व पर सर्वप्रथम और सबसे अधिक जोर महावीर स्वामी ने ही दिया है. इस आदर्श के अनुसार, हमें किसी भी रूप, मनसा-वाचा-कर्मणा, में हिंसा नहीं करनी चाहिए.
 
जैन धर्म की मान्यताओं के मुताबिक वर्द्धमान ने कठोर तप द्वारा अपनी समस्त इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर जिन अर्थात विजेता कहलाए. इन्द्रियों को जीतने के कारण वे जितेन्द्रिय कहे जाते हैं.यह कठिन तप पराक्रम के समान माना गया, इसलिए वे ‘महावीर’ कहलाए. उन्हें वीर,अतिवीर’ और ‘सन्मति’ भी कहा जाता है.
 
भगवान महावीर ने अपने उपदेशों से इस समाज का कल्याण किया है. उनकी शिक्षाओं में ये बातें प्रमुख थीं कि सत्य का पालन करो, अहिंसा को अपनाओ, जिओ और जीने दो. इसके अलावा उन्होंने पांच महाव्रत, पांच अणुव्रत, पांच समिति तथा छह आवश्यक नियमों का विस्तार पूर्वक उल्लेख किया. जो जैन धर्म के प्रमुख आधार माने गए.
 
पावापुर में कार्तिक कृष्ण अमावस्या को भगवान महावीर ने आखिरी सांस ली.

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